पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई पंचतत्व में विलीन, राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई

महान पंडवानी गायिका को अंतिम प्रणाम देने उमड़ा जनसैलाब, गनियारी मुक्तिधाम में पुत्र ने दी मुखाग्नि, कला जगत ने नम आंखों से दी विदाई

पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई पंचतत्व में विलीन, राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई

भिलाई। छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को विश्व पटल पर नई पहचान दिलाने वाली महान पंडवानी गायिका और पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई रविवार को पंचतत्व में विलीन हो गईं। दुर्ग जिले के गनियारी स्थित मुक्तिधाम में पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया। उनके पुत्र दिलहरण पारधी ने मुखाग्नि दी, जबकि पुलिस के जवानों ने गार्ड ऑफ ऑनर देकर राष्ट्र और प्रदेश की ओर से अंतिम सलामी दी।

अंतिम यात्रा में जनप्रतिनिधियों, प्रशासनिक अधिकारियों, लोक कलाकारों और हजारों श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। सभी ने पुष्पचक्र अर्पित कर छत्तीसगढ़ की इस महान सांस्कृतिक विभूति को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि दी। इस दौरान स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव, सांसद विजय बघेल, पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, विधायक डोमन लाल कोर्सेवाड़ा, ललित चंद्राकर, रिकेश सेन, अनूप शर्मा, संभागायुक्त एस.एन. राठौर, आईजी अभिषेक शांडिल्य, कलेक्टर अभिजीत सिंह और एसएसपी विजय अग्रवाल सहित अनेक गणमान्य लोग मौजूद रहे। रविवार तड़के करीब 3:15 बजे रायपुर एम्स में उन्होंने अंतिम सांस ली। वे लंबे समय से अस्वस्थ थीं और उपचाराधीन थीं। उनके निधन की खबर फैलते ही पूरे देश के कला जगत में शोक की लहर दौड़ गई। छत्तीसगढ़ ने अपनी सांस्कृतिक पहचान की सबसे बुलंद आवाज खो दी।

डॉ. तीजन बाई का जन्म वर्ष 1956 में दुर्ग जिले के गनियारी गांव के एक साधारण पारधी परिवार में हुआ था। औपचारिक शिक्षा न मिलने के बावजूद उन्होंने अपनी अद्भुत प्रतिभा, संघर्ष और समर्पण के दम पर पंडवानी जैसी लोककला को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया। बचपन में अपने नाना से सुनी महाभारत की कथाओं ने उनके जीवन की दिशा तय कर दी।

उन्होंने उस समय सामाजिक परंपराओं को चुनौती दी, जब महिलाओं का कापालिक शैली में मंच पर अभिनय करते हुए पंडवानी प्रस्तुत करना स्वीकार्य नहीं माना जाता था। विरोध, बहिष्कार और कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और अपनी सशक्त आवाज, जीवंत अभिनय तथा अनूठी प्रस्तुति से पंडवानी को नई पहचान दिलाई। उनके हाथ का तानपुरा मंच पर कभी भीम की गदा, कभी अर्जुन का धनुष और कभी दुर्योधन की तलवार बनकर दर्शकों को महाभारत के जीवंत संसार में ले जाता था।

भारत के साथ-साथ ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, स्विट्जरलैंड और तुर्की सहित अनेक देशों में अपनी प्रस्तुतियों से उन्होंने भारतीय लोककला का गौरव बढ़ाया। उनके योगदान को देखते हुए उन्हें पद्मश्री (1988), संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1995), पद्म भूषण (2003) और देश का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण (2019) प्रदान किया गया।

डॉ. तीजन बाई केवल एक लोकगायिका नहीं थीं, बल्कि संघर्ष, आत्मविश्वास और भारतीय सांस्कृतिक विरासत की जीवंत मिसाल थीं। उन्होंने साबित किया कि प्रतिभा और दृढ़ संकल्प के सामने सामाजिक बंधन कभी बाधा नहीं बन सकते। उनका जीवन और उनकी कला आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी। उनकी विदाई के साथ छत्तीसगढ़ ने अपनी सांस्कृतिक आत्मा की एक अमूल्य आवाज खो दी, लेकिन उनकी पंडवानी की गूंज सदियों तक सुनाई देती रहेगी।